न्याय एक धर्म है जिस पर सबका बराबर का अधिकार है- जस्टिस जे जे मुनीर

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वाराणसी । गांधी अध्ययनपीठ के गांधी सभागार में समाज कार्य विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ एवं इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रीसर्च, नई दिल्ली (आई.सी.एस.एस.आर) द्वारा प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।


संगोष्ठी में उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों ने महात्मा गांधी एवं शिवप्रसाद गुप्त के चित्रों पर माल्र्यापण तथा कुलगीत के गायन से संगोष्ठी का शुभारम्भ हुआ। इसके पश्चात् संगोष्ठी के आयोजन समिति के द्वारा उद्घाटन सत्र में उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों को पुष्प गुच्छ, स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्रम् देकर उनका स्वागत किया गया।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो. आनंद कुमार त्यागी, कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ द्वारा की गई। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि न्यायाधीश जे. जे. मुनीर, इलाहाबाद हाईकोर्ट, मुख्य वक्ता प्रो. नीलम सुक्रमनी, विभागाध्यक्ष, समाज कार्य विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली, संगोष्ठी के निदेशक प्रो. महेन्द्र मोहन वर्मा, संकायाध्यक्ष एवं विभागाध्यक्ष, समाज कार्य विभाग, संगोष्ठी संयोजक प्रो. अनिल कुमार चैधरी एवं संगोष्ठी सचिव प्रो. निमिषा गुप्ता एवं विश्वविद्यायल के विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष,अध्यापकगण एवं प्रतिभागीगण उपस्थित रहे।


अतिथियों का वाचिक स्वागत और अभिनंदन प्रो. महेन्द्र मोहन वर्मा, संकायाध्यक्ष एवं विभागाध्यक्ष,समाज कार्य विभाग द्वारा किया गया और उन्होने बताया कि यह संगोष्ठी न्याय की यात्रा पर केंद्रित है जो 1947, से वर्तमान तक कैसे आगे बढ़ रही है। उन्होने बताया कि संविधान अपने समस्त नागरिकों को सामाजिक,अर्थिक एवं राजनैतिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध है। संगोष्ठी के संयोजक, प्रो. अनिल कुमार चैधरी ने विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो. मुरली देसाई की बात का स्मरण करते हुए कुलपति महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ को संगोष्ठी के आयोजन की सहमति देने और शोधार्थियों के संगोष्ठी में प्रबंध सहयेाग देने के लिए आभार दिया।


 उन्होने इस संगोष्ठी को आकद्मिक स्तर और शोधार्थियों के लिए न्याय के दृष्टकोण से नये आयाम को सृजित करेगा। न्याय पर चर्चा करते हुए इससे संबंधित तथ्यों को प्रस्तुत किया और सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय की यात्रा के सकारात्मक और नकारात्मक दोनो पहलुओं पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात् संगोष्ठी में उपस्थित गणमान्य अतिथियों संगोष्ठी की स्मारिका का विमोचन किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित न्यायाधीश मिस्टर जे. जे. मुनीर, ने अपने उद्बोेधन में न्याय के विभिन्न स्वरूपों पर चर्चा करते हुए न्याय को धर्म के समान बताया। उन्होंने कहा कि न्याय सबसे बड़ा धर्म है और इस पर सभी का बराबर का हक है।


 न्याय विभिन्न विवादों में अलग अलग तरह से किस तरह से लागू होता है इसकी भी चर्चा की। तत्पश्चात् कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी द्वारा अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वास्तविक न्याय के संबंध में अपनी बात को रखते हुये डाॅ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा करते हुये भारत में न्याय और अधिकारों के साथ एक नई सुबह कैसे हो इस पर चर्चा की। आपने बताया कि कोई भी अनुपयोगी वस्तु को बनाने से बेहतर है कि उसे तैयार ही न किया जाय। उन्होने वैधानिक संस्थाओं के उन्नयन के लिये तीन बिन्दुओं पर प्रकाश डाला। सार्वभौमिक स्तर पर वैधानिक संस्थाओं का सर्वेक्षण, वैधानिक संस्थाओं का अनुश्रवण, वैधानिक संस्थाओं का प्रभावी मुल्यांकन। संगोष्ठी में प्रो. रविकान्त, प्रो. बनीब्रत महंता, द्वारा विशेष व्याख्यान दिया गया। यह विशेष सत्र प्रो. नन्दलाल, पूर्व विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ  द्वारा अध्यक्षता की गई।


 संगोष्ठी में दो तकनीकी सत्रों का संचालन किया गया जिसमें 50 से अधिक शोध पत्रों का वाचन किया गया। संगोष्ठी का संचालन डॉ. संदीप गिरि, द्वारा किया गया एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रो. निमिषा गुप्ता, संगोष्ठी संयोजिका ने किया। कार्यक्रम में विभिन्न संकायो, विभागों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, अध्यापकगण, शोधार्थी एवं प्रतिभाीगण तथा समाज कार्य विभाग के कर्मचारीगण उपस्थित रहें।

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