साहित्य इतिहास लेखन एवं दृष्टिबोध विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ समापन

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वाराणसी। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषा विभाग की हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन एवं दृष्टिबोध, सन्दर्भ बच्चन सिंह का इतिहास लेखन शीर्षक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए विख्यात चिन्तक दीपक मल्लिक ने कहा बच्चन सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्त्व ने अपने दौर की आबो हवा का न सिर्फ अवगाहन किया बल्कि अपने इतिहास लेखन में साहित्य की अनेक नयी भंगिमाओं को आवाज़ दी।


उन्होंने आगे कहा, अपने इतिहास लेखन में युगसापेक्ष और मनोगत दृष्टि को आत्मसात कर भविष्यदृष्टि रचते हैं बच्चन सिंह।मुख्य अतिथि हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रो. गजेन्द्र पाठक ने कहा बच्चन सिंह ने सरहपा को समझा और उनसे कबीर के संबंध को स्थापित किया। रीतिकाल की परिधि का विस्तार करते हुए वे उनमें मीर, नज़ीर अकबराबादी और ग़ालिब को शामिल करते हैं। मीर में उन्हें कबीर और सूर दिखाई पड़ते हैं। मीर को वे कबीर और निराला के बीच एक अनिवार्य कड़ी मानते हैं। कुल मिलाकर उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास की परिधि का, हिन्दी की लोकतांत्रिक चेतना के अनुरूप विस्तार किया। इस सत्र को सारस्वत वक्ता जेएनयू के पूर्व प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने संबोधित करते हुए इतिहास दृष्टि निर्माण की प्रक्रिया का विश्लेषण किया। उन्होंने बच्चन सिंह के उपन्यास सूतो वा सूतपुत्रो के द्वंद्व का भी विश्लेषण किया।दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी विस्तार से बच्चन सिंह के इतिहास लेखन की नयी उद्भावनाओं का ज़िक्र करते हुए कहा आलोचक बच्चन सिंह ने रीतिकाल के शृंगार बोध जैसे पारम्परिक विषयों पर लिखते हुए घरेलू बोध पर विशेष ध्यान दिया। 


वे देव की कविता के घरेलू नौकर का विश्लेषण करते हुए अपनी स्थापना को पुष्ट किया। सत्र की अध्यक्षता दयानिधि मिश्र ने की। उन्होंने बच्चन सिंह के संस्कृत और अंग्रेजी ज्ञान का विश्लेषण करते हुए कहा इन्होने अपने लेखन की परिधि में इन भाषाओं की उपलाब्धियो का भी अवसर के अनुकूल उपयोग किया। इस सत्र को बीएचयू के प्रोफ़ेसर प्रभाकर सिंह ने भी सम्बोधित किया। सरस्वती पत्रिका के सम्पादक रविनंदन सिंह ने कहा, साहित्य का इतिहास लेखन एक बड़ी दृष्टि की अपेक्षा करता है और यह दृष्टि हिंदी के कम आलोचको के पास है। डॉ. बच्चन सिंह उन्ही थोड़े आलोचको में से एक है। उनका इतिहास मील का पत्थर है जो हिंदी के पाठकों एवं अध्येताओ का मार्गदर्शन आगे भी करता रहेगा।बच्चन सिंह का साहित्येतिहास लेखन विषयक सत्र को सम्बोधित करते हुए असम विश्वविद्यालय प्रो. शीतांशु ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के संदर्भ में रामविलास जी ने यह कहा था कि 'वह वस्तुनिष्ठ भाववादी थे'। 



शुक्ल के पहले के इतिहास लेखन पर भाववाद की गहरी छाया थी। डॉक्टर बच्चन सिंह का इतिहास लेखन महत्वपूर्ण इसलिए है कि वे इसी वस्तुनिष्ठ भवाद से भौतिकवाद की यात्रा करते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उनका इतिहास 'दूसरा इतिहास' है। पूर्व प्राचार्य साकेत पी. जी. कालेज मुंबई के  इंदीवर ने कहा बच्चन सिंह इतिहास धर्मा साहित्य के अध्येता हैं। उन्होंने ने हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन मे समीक्षा काव्यशास्त्र और इतिहास का समन्वय स्थापित किया है। अपने इतिहास लेखन में उन्होंने परम्परा और परिवेश के द्वंद को बारीकी से रूपायित किया है। साहित्य लेखन में उनका आलोचक व्यक्तित्व व्यवस्थित और क्रमबद्ध ढंग से उभरा है। उनकी पैठ रीतिकाल के विश्लेषण में गहराई से उभरी है।आधुनिक साहित्य के विश्लेषण में वे आधुनिकताबोध के नहीं प्रगतिशीलता को प्रस्तुत करने वाले हैं। दरअसल उनकी वैचारिक दृष्टि आचार्य नरेंद्रदेव, लोहिया और मार्क्सवाद के प्रभाव से निर्मित हुई है। उन्होने शुक्ल जी के इतिहास पैटर्न को तोड़ा भी है। उस पर चले भी है।समीक्षक एवं कवियत्री निशि उपाध्याय ने कहा कि डॉ. बच्चन सिंह इतिहास के प्रवाहमान एवं गत्यात्मक रूप का जिक्र करते हुए उसे शाश्वतता और स्थायित्व से दूर मानते हैं। उन्होंने रचनात्मक प्रवृत्तियों एवं प्रभावों को ही साहित्य में इतिहास का संयोजक कहा तथा 'अन्य' के संबोधन से साहित्यकारों को बचाया है। 



इस सत्र को बीएचयू की सहायक अध्यापिका प्रीति त्रिपाठी ने भी सम्बोधित किया।सत्रों का संचालन डॉ.अविनाश, डॉ. सुरेन्द्र प्रताप और विद्यार्थी सत्र का संचालन उज्जवल कुमार सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अनुराग कुमार, प्रो रामाश्रय सिंह ने किया वहीं विद्यार्थी सत्र का धन्यवाद ज्ञापन अंजना भारती ने किया। इस मौके पर इस मौके पर प्रो. राजमुनि, प्रो. रामाश्रय सिंह, प्रो.अनुकूल चंद राय, डॉ. प्रीति,डॉ. अविनाश कुमार सिंह,डॉ. विजय रंजन, जनमेजय, हनुमान राम,वरुणा देवी, प्रतिभा,स्तुति राय, प्रज्ञा पाण्डेय,धर्मेन्द्र, सौरभ त्रिपाठी, प्रवीण प्रजापति, गजेन्द्र,आरती तिवारी, अमित,आकाश सिंह, गुंजन आदि शोध छात्र-छात्राएं मौजूद रहें।

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