भारतीय भाषाएँ हैं सांस्कृतिक प्रगति का हिस्सा

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वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित 'भारतीय भाषाओं में दर्शन का तत्वान्वेषण' विषयक तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का बुधवार को तीसरा दिन संपन्न हुआ,तकनीकी सत्र की अध्यक्षता दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. राजेश कुमार मिश्रा ने किया। इस सत्र में विभिन्न प्रांतो के प्रतिभागियों ने लगभग 12 शोध पत्र पढ़े,कार्यक्रम की अगली कड़ी में समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुये महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो.आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि भारत बहुभाषा वादी देश है।


हम एक भाषावादी देश (यूरोप) के अलोक में नहीं देख सकते हैं। हमारी भाषाएँ सांस्कृतिक प्रगति का हिस्सा रही हैं और स्वतः विकसित हुई हैं।उन्होंने संगोष्ठी की सफलता पर बधाई दी और कहा इस संगोष्ठी के पत्रों को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे और जो उपलब्धियां एवं नवीन विचार इस संगोष्ठी में हमें प्राप्त हुए हैं, उनको हम राज्य सरकार एवं भारत सरकार के पास राष्ट्रीय शिक्षा नीति में लागू करने हेतु प्रेषित करेंगे।



 समापन सत्र के मुख्य अतिथि दर्शनशास्त्र विभाग रोहिलखंड विश्वविद्यालय बरेली के प्रो. रज्जन कुमार ने जैन दर्शन की भाषा के आलोक में संगोष्ठी के विषय भारतीय भाषाओं में दर्शन का तत्वान्वेषण पर प्रकाश डाला। विशिष्ट अतिथि दर्शनशास्त्र विभाग बड़ौदा विश्वविद्यालय गुजरात के प्रो. टी.एस गिरीश कुमार ने अपने संक्षिप्त भाषण में भारतीय भाषाओं में दर्शन की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला और यूरोप की भाषा से अलग हटकर दर्शन की भाषा एवं शिक्षण के आयाम को बताया। द्वितीय विशिष्ट अतिथि दर्शनशास्त्र विभाग के पचायम कॉलेज चेन्नई विभागाध्यक्ष के संपत कुमार ने भारतीय भाषाओं में दर्शन की प्रासंगिकता एवं शिक्षण को बढ़ावा देने पर अपने विचार व्यक्त किये।

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