साहित्येतिहास के व्यापक दृष्टिबोध के सर्जक हैं आलोचक बच्चन सिंह - प्रो. ए.के. त्यागी

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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ उद्घाट



वाराणसी। साहित्य न केवल मनुष्यता के जय-पराजय की विश्वसनीय छवि प्रकट करता है, बल्कि वह भविष्य के निर्माण हेतु सपने देखता है और उस सपने के पक्ष में अपनी मुखर आवाज़ भी प्रकट करता है। बच्चन सिंह जैसे साहित्येतिहास लेखक अपने व्यापक दृष्टिबोध से उस साहित्य लोक को न केवल अपने लेखन में समाहित करते हैं बल्कि साहित्य को सर्वाधिक विश्वसनीय सर्जक के रूप में स्थापित भी करते हैं। उक्त वक्तव्य महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो.आनंद कुमार त्यागी ने प्रकट किया। वे हिन्दुस्तानी एकेडमी प्रयागराज, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषा विभाग, काशी विद्यापीठ तथा काशी साहित्य महोत्सव के संयुक्त तत्त्वाववधान में आयोजित दो दिवसीय "हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन एव दृष्टिबोध (बच्चन सिंह के साहित्येतिहास लेखन के विशेष सन्दर्भ में)" विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहें थे। उन्होंने आगे कहा एक राष्ट्रीय या स्थानीय परिघटना के वैश्विक प्रभाव भी बनते हैं। साहित्य में भी कोई स्थानीय संदर्भ एक विश्वदृष्टि बनाता है। यानी हमारी कलात्मक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां हमारे सृजन में भी परावर्तित होती हैं।



 भारत के बहुभाषी परिदृश्य को देखते हुए बच्चन सिंह का साहित्येतिहास इसी बहुभाषी, बहुआयामी और वैश्विक परावर्तन को संभवत: पहली बार देखता और दिखाता है। वह भारतीय ज्ञान परम्परा की विश्वदृष्टि का विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। मुख्य अतिथि प्रो.ओमप्रकाश सिंह, पूर्व अध्यक्ष भारतीय भाषा केंद्र जे.एन.यू ने कहा हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास हिन्दी साहित्य के पहले इतिहास यानि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साहित्येतिहास दर्शन से जुड़कर और टकराकर लिखा गया। साहित्येतिहास और साहित्य में अंतर है। इतिहास मानव की विकास परंपरा का अध्ययन करता है और साहित्येतिहास मानव चेतना की विकास परंपरा का अध्ययन करता है।



 आलोचना पढ़कर साहित्येतिहास नहीं लिखा जा सकता। बल्कि टेक्स्ट और आइडियोलॉजी ऑफ टेक्स्ट के अंतरसंबंधों से गुजरकर ही साहित्येतिहास लिखा जा सकता है। शुक्ल के बाद चिंतन की दिशा तेजी से आगे बढ़ी है। कई दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रविधियां साहित्येतिहास लेखन में आईं। लेकिन शुक्ल जी के बाद उनके इतिहासबोध की इस विकसनशील फलश्रुति को बच्चन सिंह ने नया आयाम दिया। अब बड़ी जिम्मेदारी नये लेखकों और साहित्येतिहास लेखकों की है। 



सारस्वत अतिथि प्रो. हरिकेश सिंह,पूर्व कुलपति, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा ने कहा मौलिकता, नमनीयता, सृजनशीलता और विस्तार जैसे वैज्ञानिक तत्त्व हैं बच्चन सिंह के साहित्येतिहास लेखन में। नाद, स्वर, लिपि, संगीत जैसे तत्त्व भी उनकी आलोचना दृष्टि में है। विशिष्ट अतिथि  प्रो. सुरेन्द्र प्रताप ने कहा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ग्रियर्सन के मॉडल को अपनाया। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस कैनन को तोड़ा। बच्चन सिंह का साहित्येतिहास इसमें आगे की कड़ी है। वह एक तरफ पुराने पड़ चुके कैनन को तोड़ते हैं तो दूसरी तरफ साहित्येतिहास लेखन के नये कैनन को तैयार करते हैं

संगोष्ठी संयोजक प्रो.निरंजन सहाय ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की और अतिथियों का स्वागत किया। इस सत्र का संचालन व्योमेश शुक्ल ने किया तथा  धन्यवाद ज्ञापन प्रो.अनुराग कुमार ने किया।साहित्य इतिहास लेखन : परम्परा और दृष्टि तथा साहित्य इतिहास लेखन की चुनौतियाँ और संमस्याएँ सत्र की अध्यक्षता प्रो. देवशंकर नवीन ने किया। उन्होंने कहा कि बच्चन सिंह की इतिहास दृष्टि न केवल उनके अपने उपयोग के लिए वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक थी बल्कि परिवर्ती काल के उपभोक्ताओं को भी उनकी दृष्टि ऐसा करने की प्रेरणा देती रही है।



 इतिहास लेखन की चुनौतियाँ वस्तुतः आती ही है इसलिए कि लोग अब राजनेताओं के तिकडमों का शिकार होकर अपने पूर्वजों को गुच्छों में बांटकर देखने लगे है। मुख्य वक्ता प्रख्यात रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल ने कहा कि प्रो. बच्चन सिंह  ने हिन्दी आलोचना की भाषा को साफ-सुथरी और ताजा बनाने के लिए एक कवि की तरह संघर्ष किया। उन्होंने आलोचना के रास्ते पर चलकर साहित्य की इतिहास लेखन की मंजिल तक पहुँचे। उन्होंने इतिहास लेखन को इकहरा और बलोच हो जाने से बचाए रखा।डॉ. बच्चन सिंह का हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास उनकी रचनात्मक कृतियों का प्रतिफल है। डॉ. साहब ने काल की अपेक्षा युग को महत्व दिया एवं स्वछंदतावाद में मुक्ति पर बल दिया। उक्त बातें मोतीलाल नेहरू कॉलेज के आचार्य डॉ. विद्याशंकर सिंह  ने कही।



अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की सहायक आचार्य डॉ. दीपशिखा ने भी अपने विचार प्रस्तुत की। इस मौके पर प्रो. राजमुनि, प्रो. रामाश्रय सिंह, प्रो. अनुकूल चंद राय, डॉ. प्रीति, डॉ. अविनाश कुमार  सिंह, डॉ. विजय रंजन, जनमेजय, हनुमान राम, वरुणा देवी, प्रतिभा, स्तुति राय, प्रज्ञा पाण्डेय, धर्मेन्द्र, सौरभ त्रिपाठी, प्रवीण प्रजापति, गजेन्द्र, आरती तिवारी, अमित, आकाश सिंह, गुंजन आदि शोध छात्र-छात्राएं मौजूद रहें। इस सत्र का संचालन डॉ. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन तापस शुक्ल ने किया।

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